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झारखंड में डेंगू जांच-इलाज होगा आसान
- Reporter 12
- 29 Mar, 2026
झारखंड सरकार ने डेंगू और चिकनगुनिया की मुफ्त जांच और इलाज के लिए 14 सेंटिनल साइट सक्रिय कर दी हैं। रिम्स, एमजीएम समेत कई अस्पतालों में सुविधा मिलेगी, जबकि 6 और जिलों में नए केंद्र तैयार किए जा रहे हैं।
रांची: झारखंड में डेंगू और चिकनगुनिया जैसी वेक्टर जनित बीमारियों से निपटने के लिए राज्य सरकार ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। बदलते मौसम और संक्रमण के खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग अब जांच और इलाज की व्यवस्था को जिला स्तर तक मजबूत करने में जुट गया है। इसी कड़ी में राज्य में डेंगू और चिकनगुनिया की मुफ्त जांच और उपचार के लिए कई अस्पतालों और प्रयोगशालाओं को सक्रिय किया गया है, ताकि मरीजों को समय पर जांच, इलाज और निगरानी की सुविधा मिल सके।
सरकार का उद्देश्य सिर्फ मरीजों का इलाज करना नहीं, बल्कि ऐसे मामलों की समय रहते पहचान कर बीमारी के फैलाव को रोकना भी है। इसके लिए सेंटिनल साइट्स यानी निगरानी और जांच केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा रही है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि यदि शुरुआती स्तर पर जांच और उपचार की व्यवस्था मजबूत होगी, तो संक्रमण को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकेगा। यही वजह है कि अब राज्य के कई हिस्सों में यह सुविधा पहले से ज्यादा व्यवस्थित और सुलभ बनाई जा रही है।
14 सेंटिनल साइट्स पर मिलेगी मुफ्त जांच और उपचार
झारखंड में अब डेंगू और चिकनगुनिया की जांच और इलाज के लिए कुल 14 सेंटिनल साइट्स को सक्रिय किया जा रहा है। इन केंद्रों पर मरीजों को न केवल जांच की सुविधा मिलेगी, बल्कि जरूरत पड़ने पर उपचार भी सरकारी व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराया जाएगा।
पहले से जिन प्रमुख संस्थानों में यह सुविधा उपलब्ध है, उनमें रिम्स रांची, सदर अस्पताल रांची, एमजीएम जमशेदपुर, पीएमसीएच धनबाद, डीपीएचएल चाईबासा और डीपीएचएल साहिबगंज शामिल हैं। ये केंद्र पहले से मरीजों की जांच और निगरानी में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
इसके अलावा अब आठ नए केंद्रों को भी इस नेटवर्क से जोड़ा गया है। इनमें एम्स देवघर, डीपीएचएल दुमका, डीपीएचएल हजारीबाग, डीपीएचएल पलामू, डीपीएचएल पूर्वी सिंहभूम और डीपीएचएल सिमडेगा जैसे संस्थान शामिल हैं। इन केंद्रों के सक्रिय होने से राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों को इलाज और जांच के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी।
यह भी पढ़ें: बरसात से पहले क्यों बढ़ जाता है डेंगू और चिकनगुनिया का खतरा
छह और जिलों में नए केंद्र बनाने की तैयारी
स्वास्थ्य विभाग ने सिर्फ मौजूदा व्यवस्था को मजबूत करने पर ही जोर नहीं दिया है, बल्कि उन जिलों पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है जहां अब तक ऐसी सुविधाएं सीमित रही हैं। इसी दिशा में बोकारो, गढ़वा, सरायकेला, गुमला, खूंटी और लोहरदगा में भी नए सेंटिनल साइट तैयार करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।
इन जिलों में केंद्र बनने के बाद स्थानीय स्तर पर जांच और इलाज की सुविधा और आसान हो जाएगी। इससे मरीजों को दूसरे शहरों या बड़े अस्पतालों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। खासकर ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों को इससे बड़ी राहत मिल सकती है।
स्वास्थ्य विभाग की रणनीति यह है कि हर क्षेत्र में बीमारी की निगरानी मजबूत हो, ताकि संक्रमण फैलने की स्थिति में तेजी से कार्रवाई की जा सके। नए केंद्र तैयार होने के बाद झारखंड का निगरानी नेटवर्क और भी ज्यादा प्रभावी माना जाएगा।
एलाइजा टेस्ट से होगी डेंगू-चिकनगुनिया की जांच
डेंगू और चिकनगुनिया की जांच के लिए राज्य में एलाइजा आधारित परीक्षण की व्यवस्था की गई है। यह जांच पद्धति संक्रमण की पुष्टि के लिए एक भरोसेमंद माध्यम मानी जाती है। मरीजों को सरकारी अस्पतालों और सेंटिनल साइट्स पर यह जांच मुफ्त में उपलब्ध कराई जाएगी।
एलाइजा जांच की सुविधा बढ़ने का मतलब यह है कि संदिग्ध मरीजों की पहचान जल्दी हो सकेगी। शुरुआती लक्षणों में अक्सर डेंगू, चिकनगुनिया और सामान्य वायरल बुखार में फर्क कर पाना मुश्किल होता है। ऐसे में लैब जांच बेहद जरूरी हो जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने लैब नेटवर्क को विस्तार देने का फैसला किया है।
इससे न केवल मरीजों को सही समय पर सही इलाज मिलेगा, बल्कि प्रशासन को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि किन इलाकों में बीमारी का खतरा बढ़ रहा है।
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की व्यवस्था
राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि डेंगू और चिकनगुनिया से जुड़े मरीजों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए जरूरी संसाधन, दवाइयां, जांच किट और निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जा रहा है।
डेंगू और चिकनगुनिया दोनों ही ऐसी बीमारियां हैं, जिनमें समय पर पहचान और उचित चिकित्सा बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर मरीज को समय पर देखभाल न मिले, तो स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे में मुफ्त इलाज की सुविधा गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए राहत की बड़ी वजह बन सकती है।
सरकारी स्तर पर इलाज की सुविधा मजबूत होने से निजी अस्पतालों पर निर्भरता भी कम होगी और मरीजों का आर्थिक बोझ घटेगा। यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग इन सेवाओं को जिला और उप-जिला स्तर तक पहुंचाने पर काम कर रहा है।
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फाइलेरिया के मामलों में बड़ी गिरावट
वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत झारखंड में सिर्फ डेंगू और चिकनगुनिया ही नहीं, बल्कि फाइलेरिया के खिलाफ भी अभियान चलाया जा रहा है। राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (MDA) कार्यक्रम के प्रभाव से फाइलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है।
साल 2025 में जून तक राज्य में फाइलेरिया के 268 मरीज पाए गए, जबकि वर्ष 2024 की इसी अवधि तक यह संख्या 776 थी। यानी मामलों में करीब 65 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग के लिए राहत भरा माना जा रहा है और इससे यह संकेत भी मिलता है कि लगातार चलाए जा रहे जनस्वास्थ्य कार्यक्रम असर दिखा रहे हैं।
फाइलेरिया जैसे रोगों पर नियंत्रण से यह भी साबित होता है कि यदि निगरानी, दवा वितरण और जागरूकता अभियान सही तरीके से चलें, तो वेक्टर जनित बीमारियों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।
हजारों मरीजों को मिला विकलांगता प्रमाण पत्र
फाइलेरिया से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने विकलांगता प्रमाण पत्र देने की प्रक्रिया भी तेज की है। जून तक राज्य में 5,053 फाइलेरिया मरीजों को विकलांगता प्रमाण पत्र जारी किया गया है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फाइलेरिया के कई मरीज लंबे समय तक शारीरिक दिक्कतों से जूझते हैं। ऐसे में प्रमाण पत्र मिलने से उन्हें सरकारी सहायता, सामाजिक सुरक्षा और अन्य लाभ लेने में सुविधा होती है। यह पहल दिखाती है कि सरकार सिर्फ बीमारी की रोकथाम तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रभावित लोगों के सामाजिक और आर्थिक पक्ष पर भी ध्यान दे रही है।
मलेरिया जांच में भी बढ़ोतरी
झारखंड में बुखार से जुड़े मामलों की जांच को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग अधिक सक्रिय दिख रहा है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 जून की तुलना में इस वर्ष जून तक बुखार पीड़ितों की मलेरिया जांच में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इसका मतलब है कि अब संदिग्ध बुखार के मामलों की ज्यादा गंभीरता से जांच की जा रही है। यह रणनीति इसलिए अहम है क्योंकि डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया—तीनों में शुरुआती लक्षण कई बार एक जैसे नजर आते हैं। यदि समय पर सही जांच हो जाए, तो मरीज को सही इलाज जल्दी मिल सकता है।
बढ़ती जांच यह भी दिखाती है कि स्वास्थ्य विभाग बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।
रांची में डेंगू के मामले फिलहाल नियंत्रण में
स्वास्थ्य विभाग के लिए राहत की बात यह भी है कि रांची जिले में डेंगू के संदिग्ध मामलों की जांच में फिलहाल स्थिति ज्यादा चिंताजनक नहीं दिखी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 169 सैंपल्स की जांच में सिर्फ 8 केस पॉजिटिव पाए गए हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी मरीज माइग्रेटेड केस बताए गए हैं, यानी वे दूसरे राज्यों से संक्रमित होकर झारखंड लौटे थे। इससे यह संकेत मिलता है कि स्थानीय स्तर पर अभी डेंगू का व्यापक प्रसार नहीं हुआ है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला भी नहीं है।
स्वास्थ्य विभाग के लिए यह स्थिति एक चेतावनी की तरह भी है, क्योंकि बाहर से आने वाले संक्रमित मरीजों के जरिए बीमारी फैलने की आशंका बनी रहती है। इसलिए निगरानी और जांच की प्रक्रिया को और सख्त किया जा रहा है।
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स्वास्थ्य विभाग की रणनीति क्या है?
राज्य सरकार की पूरी रणनीति का फोकस अब रोकथाम, समय पर जांच, मुफ्त इलाज और निगरानी पर है। स्वास्थ्य विभाग समझता है कि डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां केवल इलाज से नहीं, बल्कि समय पर पहचान और जागरूकता से ज्यादा नियंत्रित की जा सकती हैं।
इसीलिए सेंटिनल साइट्स की संख्या बढ़ाने, लैब नेटवर्क मजबूत करने, मुफ्त जांच उपलब्ध कराने और सरकारी अस्पतालों में उपचार व्यवस्था दुरुस्त करने पर जोर दिया जा रहा है। आने वाले समय में यदि यह व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी हो जाती है, तो झारखंड में वेक्टर जनित रोगों पर नियंत्रण की दिशा में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
निष्कर्ष
झारखंड सरकार की नई पहल से यह साफ है कि राज्य अब डेंगू और चिकनगुनिया जैसे संक्रमणों से लड़ाई को ज्यादा गंभीरता से ले रहा है। 14 सेंटिनल साइट्स को सक्रिय करना और 6 नए जिलों में जांच केंद्र विकसित करने की योजना, दोनों ही इस दिशा में अहम कदम हैं।
मुफ्त जांच, मुफ्त इलाज, बेहतर निगरानी और विस्तारित लैब नेटवर्क से आम लोगों को निश्चित रूप से राहत मिलेगी। साथ ही फाइलेरिया और मलेरिया जैसे अन्य वेक्टर जनित रोगों पर भी सरकार की सक्रियता यह दिखाती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर अब अधिक व्यापक और संगठित रणनीति अपनाई जा रही है।
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